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इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर भारत में सबसे आम दस कैंसर में से एक है। यह पुरुषों में अधिक आम है। तम्बाकू और शराब का सेवन और पान सुपारी खाने से इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर होता है।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर आमतौर पर इसोफेगस (अन्न –नलिका) की अंदरुनी परत जो मांसल खोखली ट्यूब होती है, जो मुंह को पेट से जोड़ती है उस नलिका में उत्पन्न होता है। हालाँकि, इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर आंतरिक परत में अधिक सामान्य है लेकीन यह इसोफेगस (अन्न –नलिका) की अन्य परतों को भी प्रभावित कर सकता है।
एइसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर भारत में सबसे आम दस कैंसर में से एक है, और यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक प्रचलित है। इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के लिए मुख्य ज्ञात जोखिम कारकों में तम्बाकू और शराब का सेवन और पान सुपारी खाना शामिल हैं।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर, जो गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर में से एक है, इस कैंसर की उत्पत्ति के स्थान के आधार पर इसे विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है :
एडेनोकार्सिनोमा कैंसर इसोफेगस (अन्न – नलिका) के निचले क्षेत्रों में और ऊपरी पेट में पाई जाने वाली ग्रंथियों की सेल्स (कोशिकाओं) से शुरू होते हैं।
स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा इसोफेगस (अन्न – नलिका) की आंतरिक परत में मौजूद स्क्वैमस सेल्स (कोशिकाओं) में शुरू होता है। धूम्रपान और शराब का अत्यधिक सेवन स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा की बढ़ती घटनाओं के साथ दृढ़ता से जुड़ा हुआ है। भारत में, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा एडेनोकार्सिनोमा से कहीं अधिक आम हैं।
स्मॉल सेल कार्सिनोमा इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का कम प्रचलित प्रकार है। यह न्यूरोएंडोक्राइन सेल्स (कोशिकाओं) में बनता है।
ज्यादातर मामलों में, निगलने में कठिनाई महसूस होना यह इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का प्रारंभिक लक्षण है। भोजन गले में फंसा हुआ है ऐसा मरीज़ों को महसूस हो सकता हैं और वे घुटन का अनुभव भी कर सकते हैं। शुरुआत में, यह लक्षण हल्के होते है; हालांकि, जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, यह लक्षण गंभीर हो जाते है और मरीज़ को तरल पदार्थ निगलने में भी कठिनाई हो सकती है। इसोफेगस (अन्न – नलिका) के कैंसर के अन्य प्रमुख लक्षण हैं :
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के कारणों के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। फिर भी, शोधकर्ताओं ने ऐसे कई जोखिम कारकों की खोज की है जो इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के विकास का कारण बन सकते हैं :
अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त होने से इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।
दीर्घकालिक जीईआरडी इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के विकास के उच्च जोखिम से जुड़ा हुआ है।
जिन लोगों ने अतीत में गैस्ट्रेक्टोमी की है, उन लोगों में इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
अधिक जोखिम वाले ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) संक्रमण इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के जोखिम कारकों में से एक है।
तम्बाकू और शराब का सेवन करने वाले लोगों में इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का खतरा अधिक होता है।
रेड मीट (लाल मांस) या प्रोसेस्ड मीट (संसाधित मांस) खाने से इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।
भोजन में ज़िंक और सेलेनियम की कम मात्रा इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का कारण बन सकती है।
अध्ययनों से यह पता चलता है कि सुपारी के सेवन के कारण युवा आबादी में इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर बढ़ जाता है। यह खराब कीमोरिडिएशन (रसायनविकिरण) प्रतिक्रिया और कम उत्तरजीविता दर का भी कारण बनता है।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का पता लगाने और निदान करने के लिए विभिन्न परीक्षण विधियाँ उपलब्ध हैं :
इस परीक्षण के दौरान, मरीज़ को बेरियम युक्त तरल को निगलने के लिए कहा जाता है और कुछ समय बाद एक्स-रे किया जाता है। बेरियम इसोफेगस (अन्न – नलिका) के अंदरूनी हिस्से को फिल्माता है, जिससे विशेषज्ञ को एक्स-रे स्कैन पर ऊतकों में किसी भी बदलाव को देखने की सुविधा मिलती है।
एंडोस्कोपी के दौरान एक वीडियो लेंस (वीडियोएंडोस्कोप) के साथ एक लचीली ट्यूब को मरीज़ के गले और इसोफेगस (अन्न – नलिका) में पारित किया जाता है। यह प्रक्रिया इसोफेगस (अन्न – नलिका) की जांच और कैंसर या सूजन वाले क्षेत्रों की तलाश करने में मदद करती है।
रोग की सीमा को समझने के लिए इमेजिंग टेस्ट, अर्थात् पेट सीटी, अल्ट्रासाउंड इत्यादि की सिफारिश की जाती है। ये परीक्षण रोग की स्टेजिंग, उपचार योजना, चिकित्सा निगरानी और रोग की रीस्टेजिंग में मदद करते हैं।
एंडोस्कोपी के दौरान बायोप्सी के लिए नमूना इकठ्ठा किया जा सकता है। इकठ्ठा किए गए ऊतक के नमूने को बाद में प्रयोगशाला में भेजा जाता है जहां कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) की उपस्थिति के लिए इसकी जांच की जाती है।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के लिए उपचार के कई विकल्प उपलब्ध हैं, भले ही वह किसी भी चरण में हो। एचसीजी में भारत के सबसे अच्छे इसोफेजियल कैंसर विशेषज्ञ हैं, जो मरीज़ की जानकारी का अच्छी तरह से आकलन करते हैं और कई महत्वपूर्ण कारक जैसे की रोग का चरण, ट्यूमर का सटीक स्थान, ट्यूमर का ग्रेड, मरीज़ की उम्र, मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति और अंत में, उसकी प्राथमिकताएँ इन कारकों के आधार पर उपचार योजना तैयार करते है।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के लिए उपलब्ध मुख्य उपचार विकल्पों में सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा), कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा), लेजर सर्जरी और अन्य जीआई प्रक्रियाएं शामिल हैं।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर को या तो ओपन सर्जरी या मिनिमली इनवेसिव (कम से कम चिरफाड वाली) सर्जरी के माध्यम से ऑपरेट किया जा सकता है। ट्यूमर का चरण, उसका स्थान, मरीज़ की उम्र और मरीज़ की कुल स्वास्थ्य स्थिति जैसे कारको के आधार पर सर्जिकल प्रक्रिया को चुना जाएगा। इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर जिसने इसोफेगस (अन्न –नलिका) दीवार पर आक्रमण किया है और नोड पॉजिटिव हैं उसके लिए सर्जरी उपचार की मुख्य पद्धति है ।इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का इलाज रोबोटिक सर्जरी के साथ भी किया जा सकता है, रोबोटिक सर्जरी मरीज़ों के लिए कई फायदे लेकर आती है, जैसे कि कम समय के लिए अस्पताल में रहना, कम रक्तस्त्राव और दर्द कम, उपचार की कम जटिलताएँ और तेजी से रिकवरी (स्वास्थ्य लाभ)।
कीमोथेरेपी पूरे शरीर में कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने के लिए प्रभावशाली दवाओं का उपयोग करती है। रेडिएशन थेरेपी (विकिरण चिकित्सा) की तरह, कीमोथेरेपी को इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर की सर्जरी से पहले या सर्जरी के बाद में प्रशासित किया जा सकता है। कीमोथेरेपी का उपयोग सर्जरी से पहले ट्यूमर को सिकुड़ने के लिए किया जा सकता है, सर्जरी के बाद बची हुई कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को नष्ट करने और उन्नत चरण के कैंसर के मरीज़ों में दर्द को कम करने के लिए भी इसका उपयोग किया जा सकता है।
इम्यूनोथेरेपी प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को अधिक प्रभावी ढंग से पहचानने और नष्ट करने की अनुमति देकर काम करती है। चेकप्वाइंट अवरोधक कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) और / या प्रतिरक्षा सेल्स (कोशिकाओं) की सतह पर कुछ प्रोटीन रिसेप्टर्स को अवरुद्ध करके कार्य करते हैं और आमतौर पर इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के उपचार और प्रबंधन में उपयोग किए जाते हैं।
कुछ इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के मरीज़ों को टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) से लाभ हो सकता है जो कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) पर मौजूद विशिष्ट प्रोटीन को लक्षित करता है और उनके विकास और वृद्धि का समर्थन करता है। यदि सर्जरी (शल्य चिकित्सा) व्यवहार्य नहीं है या कुछ स्थितियों में, उन्नत इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का इलाज करने की अन्य उपचार विधियों को प्रतिक्रिया नहीं देते हैं तो टार्गेटेड थेरेपी (लक्षित चिकित्सा) की सिफारिश की जा सकती है ।
इसोफेजियल (अन्न – नलिका) में रुकावट पैदा कर करने वाले अधिक उन्नत कैंसर के इलाज के लिए एंडोस्कोपिक लेजर सर्जरी का उपयोग किया जा सकता है । अवरोध में छेद करने और मरीज़ों के लिए निगलने की कठिनाइयों को कम करने के लिए लेजर का पैलीएटिव थेरेपी (उपशामक चिकित्सा) के एक भाग के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
पीडीटी में फोटोएक्टिव एजेंटों (नान-थर्मल प्रकाश द्वारा सक्रिय दवाएं) का उपयोग शामिल है जो कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) द्वारा अवशोषित किए जाते हैं; ये फोटोएक्टिव दवाएं अंततः कैंसर सेल्स (कोशिकाओं) को मार देती हैं। इस उपचार का उपयोग निगलने में कठिनाई जैसे इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के लक्षणों को कम करने के लिए किया जा सकता है।इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के प्रबंधन में उपयोग की जाने वाली अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल प्रक्रियाओं में बैलून डाइलेशन, क्रायोथेरेपी, स्टेंट प्लेसमेंट आदि शामिल हैं।
सबसे आक्रामक कैंसर में से एक होने के बावजूद, कई मामलों में इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर इलाज और प्रबंधन किया जा सकता है। शुरुआती चरण के इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर का बेहतर नैदानिक परिणामों और बेहतर उत्तरजीविता दर के साथ इलाज किया जा सकता है।
किसी भी लक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और कोई भी लक्षण अगर दो सप्ताह से अधिक समय तक बना रहता है, तो उसके लिए जल्द से जल्द डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए - इससे बीमारी का जल्द पता लगाने और समय पर उपचार करने में मदद मिलती है।
बैरेट्स इसोफेगस (अन्न – नलिका) एक ऐसी स्थिति है जिसमें इसोफेगस (अन्न – नलिका) के अस्तर में सेल्स (कोशिकाएं) बदलने लगती हैं। एसिड रिफ्लक्स (जीईआरडी) वाले लोगों में यह स्थिति अधिक प्रचलित है; हालांकि, जिन लोगों में जीईआरडी नहीं है, उनमें भी बैरेट्स इसोफेगस (अन्न –नलिका) विकसित हो सकता है। इस स्थिति वाले व्यक्तियों को इसोफेजियल एडेनोकार्सिनोमा विकसित होने का खतरा अधिक होता है।
हालांकि बैरेट्स इसोफेगस (अन्न – नलिका) वाले व्यक्तियों के केवल छोटेसे प्रतिशत लोगों में ही इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर विकसित हो सकता है, यदि उन्हे इसका निदान हुआ हैं तो उनके लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे स्थिति की निगरानी करें।
प्रशासित किए गए उपचार के प्रकार के आधार पर हर एक मरीज़ में दुष्प्रभाव भिन्न भिन्न हो सकते हैं। संभावित दुष्प्रभावों में थकान, मतली और उल्टी, दस्त, बालों का झड़ना, निगलते समय दर्द, पाचन से संबंधित समस्याएं, सिरदर्द, रक्तस्राव आदि शामिल हैं।
कुछ लोगों को उपचार के बाद उनकी स्वास्थ्य स्थिति की गंभीरता और उपचार योजना के आधार पर कम मात्रा में, बार बार भोजन खाने की आवश्यकता हो सकती है। अपने निगलने के कौशल को नये सिरे से सिखने के लिए उन्हें पेशेवर या स्पीच थेरेपी (भाषण चिकित्सा) की भी आवश्यकता हो सकती है।
उपचार से संबंधित किसी भी जटिलता को समय पर संबोधित करना सुनिश्चित करने के लिए उपचार के बाद नियमित चिकित्सा जांच आवश्यक होती है । रिलैप्स (पुनरावर्तन) के जोखिम को कम करने के लिए भी ये फॉलो-अप महत्वपूर्ण हैं। यदि पुनरावृत्ति के कोई संकेत नहीं हैं तो अपॉइंटमेंट के बीच का अंतराल धीरे-धीरे बढ़ा दिया जाएगा। हालांकि, पुनरावृत्ति के संकेतों के लिए डॉक्टर नियमित रूप से मरीज़ों की निगरानी करना जारी रखेंगे।
यद्यपि आप इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर को पूरी तरह से रोक नहीं सकते हैं, यहां कुछ चीजें हैं जो आप इस बीमारी के विकास के जोखिम को कम करने के लिए कर सकते हैं। तंबाकू और शराब के सेवन से बचना चाहिए। आपको अपना वजन भी नियंत्रण में रखना चाहिए क्योंकि मोटापा इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के जोखिम कारकों में से एक है।
जीईआरडी या एसिड रिफ्लक्स को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और इसका ठीक से इलाज किया जाना चाहिए क्योंकि यह बैरेट्स इसोफेगस (अन्न – नलिका) और इसोफेगस (अन्न – नलिका) के कैंसर के विकास से जुड़ा हुआ है। आपके लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि आप रेड मीट (लाल मांस) का सेवन कम करें और आपके इसोफेजियल (अन्न – नलिका) कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए संतुलित और पौष्टिक आहार लेना सुनिश्चित करें।